टाइम्स नाउ मध्य प्रदेश संवादाता रामराव देशमुख बैतूल 9425002494
बैतूल । यह दांडिक अपील, न्यायालय नीलम खटाना, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, मुलताई जिला बैतूल के परक्राम्य लिखत प्रकरण SCNIA क0-02/2022 झाडू विरूद्ध संजय में घोषित निर्णय दिनांक-08.04.2024 से व्यथित होकर प्रस्तुत की गईहै, जिसके अनुसार, विद्वान विचारण न्यायालय ने अपीलार्थी/ अभियुक्त को धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम में 6 माह के सश्रम कारावास से दण्डित किया गया है तथा धारा-357 (3) दं०प्र०सं० के अंतर्गत परिवादी को प्रतिकर के रूप में 1,31,000/- रूपये अदा करने हेतु आदेशित किया गया है, उक्त प्रतिकर राशि प्रदाय करने के व्यतिक्रम की दशा में 2 माह का साधारण कारावास भुगताये जाने हेतु दण्डित किया गया है।
परिवाद पत्र संक्षेप में इस प्रकार है कि परिवादी झाडू ग्राम बांगा, तहसील आमला, जिला बैतूल का निवासी होकर कृषि कार्य करता है। आरोपी ग्राम खेड़ली बाजार तहसील आमला का निवासी होकर वकालत का कार्य करता है। परिवादी एवं आरोपी काफी समय से एक-दूसरे को जानते हैं तथा उनके मध्य घनिष्ठ मित्रता के संबंध है। आरोपी ने अपनी निजी आवश्यकता हेतु परिवादी से 1,08,000/- रुपये उधार लिये थे, जिसकी अदायगी हेतु उसने दिनांक 22.10.2021 को भारतीय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया शाखा मुलताई के बचत खाता कमांक-30444017369 का एक चैक क्रमांक-725390 राशि 1,08,000/- रुपये अपने हस्ताक्षर से जारी कर परिवादी को दिया गया था। परिवादी ने अभियुक्त द्वारा दिया गया उक्त चैक सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया शाखा खेड़ली बाजार स्थित अपने खाता कमांक-3297543402 में चैक की राशि का भुगतान प्राप्त करने हेतु जमा किया गया, परंतु सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया शाखा खेड़ली बाजार द्वारा परिवादी को 24.11.2021 को अभियुक्त द्वारा दिया गया चैक क्रमांक-725390 खाते में निधि कम (Funds in Sufficent) की टीप के साथ चैक वापस कर दिया गया।
परिवादी ने परिवाद पत्र में यह भी अभिवचन किया है कि-परिवादी द्वारा चैक अनादरित होने की जानकारी अभियुक्त को मोबाईल पर दी गई तथा उसे चैक की राशि नगद भुगतान करने हेतु बोला गया तथा परिवादी द्वारा अभियुक्त को मोबाईल पर फोन करके बार-बार राशि की मांग की गई, परंतु 1.26अभियुक्त द्वारा उसे कोई संतोषजनक उत्तर न देकर टाल-मटोल किया गया तथा उसके द्वारा अभियुक्त को फोन करने पर कोई जवाब नहीं दिया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि अभियुक्त के खाते में पर्याप्त धनराशि जमा नहीं थी, फिर भी अभियुक्त ने परिवादी को उक्त राशि का चैक प्रदान किया गया, तब परिवादी द्वारा अपने अधिवक्ता के माध्यम से अभियुक्त को दिनांक 08.12.2021 को रजिस्टर्ड सूचना पत्र देकर चैक की राशि का भुगतान 15 दिनों में करने हेतु सूचित करने के बावजूद भी अभियुक्त द्वारा जानबूझकर परिवादी को चैक की राशि अदा नहीं की गई और ना ही नोटिस का जवाब दिया गया। अभियुक्त के द्वारा परिवादी के साथ जानबूझकर धोखाधड़ी करने की नियत से अपने खाते में अपर्याप्त राशि होते हुए भी उसे अधिक राशि की चैक दिया गया है। अतः परिवादी ने अभियुक्त से उक्त चैक की दुगनी राशि उसे दिलाये जाने का निवेदन किया है। विद्वान विचारण न्यायालय के द्वारा अभियुक्त/अपीलार्थी के विरूद्ध धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अधीन अपराध विवरण विरचित किया जाकर अभियुक्त को सुनाये व समझाये जाने पर अभियुक्त द्वारा दोषी नहीं होने का अभिवाक् किया गया तथा विचारण की मांग की गई। अभियुक्त की प्रमुख प्रतिरक्षा यह रही है कि उसके द्वारा परिवादी को एक चैक अमानत के तौर पर दिया गया था, जिसकी राशि उसके द्वारा किस्तों में दिनांक 22.12.2021 को 50,000/- रुपये नगद एवं इसके बाद फोन पेय के माध्यम से तथा नगद राशि चैक में अंकित कर दी गयी, अब कोई राशि देना शेष नहीं है। अभियुक्त संजय की ओर से अपने प्रतिरक्षा में स्वयं को बचाव साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है।
विचारण न्यायालय द्वारा विचारण के अंतर्गत परिवादी के कथन लिये गये तथा अभियुक्त परीक्षण किये जाने के उपरांत तर्क श्रवण किये जाकर निर्णय में किये गये साक्ष्य विश्लेषण के आधार पर अपीलार्थी / अभियुक्त को धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अधीन निर्णय कंडिका क0-1 अनुसार दण्डित किया गया है।
अभियुक्त द्वारा विचारण न्यायालय के उक्त निर्णय से व्यथित होकर उक्त निर्णय के विरूद्ध यह अपील प्रस्तुत की गई है। अपील के ज्ञापन में प्रमुख रूप से यह आधार लिये गये हैं कि, विचारण न्यायालय द्वारा पारित प्रश्नाधीन निर्णय वैधानिक प्रावधानों व विधि के सुस्थापित सिद्धांतों के विपरीत होने से स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है। विचारण न्यायालय द्वारा परिवादी / प्रत्यर्थी व अपीलार्थी की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य का अयुक्तियुक्त मूल्यांकन कर निर्णय पारित किया गया है। विचारण न्यायालय द्वारा प्रश्नाधीन निर्णय में अपने स्थानीय न्यायिक परिसीमा के बाहर के प्रकरण की सुनवाई व निराकरण करते हुए अपीलार्थी को दोषसिद्ध कर प्रकरण की सुनवाई से संबंधित क्षेत्राधिकार के वैधानिक प्रावधान को अनदेखा कर गंभीर त्रुटि की है। अतः अपीलार्थी की ओर से प्रस्तुत अपील स्वीकार कर विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय व दण्डादेश निरस्त कर उसे दोषमुक्त किये जाने का निवेदन किया है।
परिवादी / उत्तरवादी ने अपील का लिखित उत्तर प्रस्तुत नहीं किया है और व्यक्त किया है कि, विद्वान विचारण न्यायालय के द्वारा समुचित निर्णय एवं दण्डादेश पारित किया गया है। अतः अपीलार्थी की ओर से प्रस्तुत अपील निरस्त किये जाने का निवेदन किया है।
अपील के निराकरण हेतु विचारणीय प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या विचारण न्यायालय ने उनके समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य का समुचित विश्लेषण न करते हुए अपीलार्थी/अभियुक्त को धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अपराध के आरोप में दोषसिद्ध ठहराये जाने में त्रुटि की है ?
निष्कर्ष सकारण विचारणीय प्रश्न क्रमांक 1अपीलार्थी की ओर से इस आशय के लिखित तर्क प्रस्तुत किये गये है कि परकाम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम 2015 की धारा 142 (2) (क) में यह उल्लेखित किया गया है कि धारा 138 परकाम्य लिखत अधिनियम के तहत प्रस्तुत 26परिवाद क्षेत्रीय अधिकारिता रखने वाले न्यायालय के समक्ष दाखिल किया जाना चाहिए, परिवादी द्वारा चैक खाते के माध्यम से भुगतान किये जाने हेतु स्वयं के सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया शाखा खेडली बाजार, तहसील आमला में चैक प्रस्तुत किया गया था, उक्त संशोधन अधिनियम अनुसार परिवादी द्वारा जिस बैंक में स्वयं के द्वारा संधारित खाते में चैक भुगतान हेतु प्रस्तुत किया गया था, उक्त क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायालय अर्थात् आमला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। अधीनस्थ न्यायालय द्वारा उक्त तर्क पर विचार किये बगैर त्रुटिपूर्ण निर्णय पारित किया है। अपीलार्थी की ओर से इस संबंध में अपनी निर्भरता न्यायिक दृष्टात मेसर्स ब्रिज स्टोन इंडिया विरूद्ध इन्द्रपालसिंह पर व्यक्त की गई है। अतः अपीलार्थी द्वारा यह निवेदन किया गया है कि क्षेत्राधिकार के अभाव में प्रस्तुत अपील स्वीकार कर आलोच्य निर्णय अपास्त किया जावे।
अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत न्यायिक दृष्टांत मेसर्स ब्रिज स्टोन (उपरोक्त) के अवलोकन से यह दर्शित है कि अभियुक्त द्वारा परिवादी को जारी किया गया चैक वर्ष 2006 में जारी किया गया था जो कि दिनांक 04.08.2006 को परिवादी कंपनी द्वारा अपने इंदौर स्थित खाते में जमा किये जाने पर अनावृत हो गया था। विचारण न्यायालय के समक्ष अभियुक्त द्वारा धारा 177 द.प्र.सं. का आवेदन पत्र इंदौर न्यायालय को क्षेत्राधिकार न होने के संबंध में प्रस्तुत किया गया था जो कि विचारण न्यायालय द्वारा निरस्त किया गया था। उक्त आदेश से असंतुष्ट होकर अभियुक्त द्वारा माननीय उच्च न्यायालय खण्डपीठ इंदौर के समक्ष धारा 482 की याचिका प्रस्तुत की गई थी, जो कि विचारण न्यायालय को अन्य दस्तावेजों को विचार में लेते हुए पुनः आदेश पारित करने के निर्देश के साथ निरस्त कर दी गयी थी, तत्पश्चात् पुनः विचारण न्यायालय द्वारा उक्ताशय का आदेश पारित किया गया था, जिससे असंतुष्ट होकर अभियुक्त द्वारा धारा 482 की याचिका प्रस्तुत किये जाने पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक दृष्टांत के. भास्करण व दशरथ रूपसिंह राठौर के आलोक में यह धारित किया कि अभियुक्त (लेखीवाल) के धारक बैंक (चण्डीगढ़) जहां परअभियुक्त का खाता संधारित है, के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किया जाना चाहिए। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा परकाम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम की धारा 142 (2) (क) के आलोक में उक्त संशोधन प्रभाव को भूतलक्षी मानते हुए यह अवधारित किया है कि इंदौर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी न्यायालय को उक्त संशोधन अधिनियम, 2015 के आलोक में क्षेत्राधिकार प्राप्त होता है, क्योंकि चैक परिवादी द्वारा अपनी इंदौर बैंक में संधारित खाते में संग्रहण हेतु प्रस्तुत किया था। इस आधार पर माननीय म.प्र. उच्च न्यायालय के इस आशय के आदेश कि, अभियुक्त के धारक बैंक अर्थात् चंडीगढ़ के क्षेत्राधिकार न्यायालय में परिवाद पत्र प्रस्तुत किया जाना चाहिए, आदेश दिनांक 05.05.2011 को अपास्त किया था।
विद्वान विचारण न्यायालय के अभिलेख का परिशीलन किया गया। अभिलेख के अवलोकन से यह दर्शित है कि अभियुक्त संजय के द्वारा परिवादी झाडू को अपने भारतीय स्टेट बैंक शाखा मुलताई का चैक क्रमांक-725390 प्रदर्श पी-1 राशि 1,08,000/- रुपये उधार राशि के एवज में देना बताया है। परिवादी झाडू द्वारा उक्त चैक प्रदर्श पी-1 अपने सेंटल बैंक ऑफ इंडिया शाखा खेड़लीबाजार खाता क्रमांक-3297543402 प्रस्तुत किया गया था जो कि दिनांक 24.11.2021 को अनादृत हो गया था। इस संबंध में परिवादी द्वारा अभिलेख पर अनादरण मेमों प्रदर्श पी-4 प्रस्तुत किया है। इससे दर्शित है कि परिवादी द्वारा बतौर सम्यक अनुक्रम पाने वाला (Payee) या धारक के रूप में अपने बैंक में खाते के माध्यम से संग्रहण हेतु प्रस्तुत किया था। इस प्रकार धारा 142 उपधारा 2 (क) अनुसार प्रदर्श पी-1 का चैक खेड़ली बाजार आमला स्थित में संग्रहण के लिए प्रस्तुत किया गया है।
यदि उपरोक्त विधिक स्थिति के आलोक में विचार करें तो धारा 142 परकाम्य लिखत अधिनियम की उपधारा 2 में संशोधन अधिनियम 2015 प्रवृत्त दिनांक 15.06.2015 प्रतिस्थापित किया गया है जो कि निम्नानुसार है-
(क) धारा 138 के अधीन किसी अपराध के लिए, कोई भी न्यायालयचैक के अधीन राशि प्राप्त करने वाले अथवा सामान्य अनुक्रम में चैक के धारक के लिखित परिवाद के सिवाय, प्रसंज्ञान नहीं लेगा
ख) ऐसा परिवाद धारा 138 के परन्तुक के खण्ड (ग) के अधीन वाद हेतुक उत्पन्न होने की तिथि से एक माह के अंदर पेश कर दिया जाना चाहिए:
परंतु न्यायालय के द्वारा वर्णित अवधि के पश्चात् परिवाद का प्रसंज्ञान लिया जा सकता है, यदि परिवादी न्यायालय को संतुष्ट करता है कि ऐसे अवधि के दौरान उसके पास परिवाद पेश नहीं करने के लिए पर्याप्त कारण था।
उक्त प्रावधान से यह स्पष्ट है कि चैक पाने वाला या सम्यक अनुक्रम धारक किसे चैक परिदत्त किया गया है उसके द्वारा धारित खाते वाले बैंक में चैक संग्रहण हेतु प्रस्तुत करता है तो परिवादी द्वारा पोषित बैंक वाले न्यायालय को प्रादेशिक क्षेत्राधिकार प्राप्त होता है अथवा पाने वाले या धारक के द्वारा अपने खाते से अन्यथा चैक प्रस्तुत किया है तो लेखीवाल के द्वारा संधारित बैंक शाखा, जिसमें लेखीवाल का खाता पोषित है, वहाँ के न्यायालय को प्रादेशिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है। हस्तगत प्रकरण में विचार करें तो परिवादी द्वारा अपने खेडली बाजार स्थित बैंक में प्रस्तुत किया गया है। हस्तगत प्रकरण में अभियुक्त द्वारा क्षेत्राधिकार के संबंध में विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष कोई भी आपत्ति नहीं ली गयी है। उक्त न्यायिक दृष्टांत मेसर्स ब्रिज स्टोन (उपरोक्त) अनुसार अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा विचारण अयायालय के समक्ष उक्ताशय का कोई भी आवेदन पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है, अपील स्तर पर यह प्रथम बार आपत्ति ली गई है। अब यह विचारणीय है कि क्या गलत स्थान पर कार्यवाही किये जाने के आधार पर विचारण न्यायालय की कार्यवाही दूषित हो जाती है। इस संबंध में धारा 460 (ड़) द.प्र.स. उपबंधित करती है कि वे ई.जिलीअनियमिततायें जो कार्यवाही को दूषित नहीं करती है किसी अपराध का धारा 190 की उपधारा 1 के खण्ड (क) या (ख) के अधीन संज्ञान करना।
461 (ट) द.प्र.सं. उपबंधित करती है कि वे अनियमितता जो कार्यवाही को दूषित करती है- किसी अपराध का धारा 190 की उपधारा (1) खण्ड (ग) के अधीन संज्ञान करना।
धारा 462 द.प्र.सं. उपबंधित करती है कि गलत स्थान में कार्यवाही-किसी दण्ड न्यायालय का कोई निष्कर्ष, दण्डादेश या आदेश केवल इस आधार पर पर कि वह जाँच, विचारण या अन्य कार्यवाही जिसके अनुक्रम में उस निष्कर्ष पर पहुँच गया था या वह दण्डादेश या आदेश पारित किया गया था, गलत सेशन खण्ड जिला, उपखंड या अन्य स्थानीय क्षेत्र में हुई थी, उस दशा में ही अपास्त किया जायेगा, जब यह प्रतीत होता है कि ऐसी गलती के कारण वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है।
यदि उपरोक्त सभी प्रावधानों का समेकित रूप से अवलोकन करें तो हस्तगत प्रकरण में भी धारा 190 की उपधारा 1 खण्ड (क) के अधीन “परिवाद” पर सदभावना पूर्वक न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मुलताई द्वारा संज्ञान लिया गया है। धारा 461 (ट) द.प्र.सं. के अधीन धारा 190 की उपधारा (1) खण्ड (ग) के अंतर्गत संज्ञान मजिस्ट्रेट द्वारा नहीं लिया गया है। धारा 460 (ड़) द.प्र.स. अनुसार ऐसी कार्यवाही व विचारण गलत न्यायालय / स्थान पर होने के आधार पर दूषित नहीं होती है, इसी संबंध में धारा 462 द.प्र.सं. ऐसी कार्यवाही को संरक्षित किया गया है। हस्तगत प्रकरण में बचाव पक्ष की प्रतिरक्षा पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव उक्त अनियमितता के कारण होना परिलक्षित नहीं है। इस बिन्दु को अपीलार्थी द्वारा अपील में जरूर उठाया गया है, परंतु उक्त अनियमितता से वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है, ऐसा परिलक्षित नहीं होता है, क्योंकि अभियुक्त ने अपनी सभी संभाव्य प्रतिरक्षा को विचारण न्यायालय के समक्ष उठाया है। इस संबंध में ईलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसके अलावा विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष बचाव पक्ष द्वारा इस बिन्दु को नहीं उठाया है। बचाव पक्ष द्वारा झाडू परिवादी साक्षी क.1 को प्रतिपरीक्षण में इस आधार पर कोई भी चुनौती नहीं दी गयी है। प्रतिरक्षा साक्षी के रूप में अभियुक्त संजय पंडोले स्वयं परीक्षित हुआ है। अभियुक्त द्वारा अपनी साक्ष्य के दौरान उक्त प्रतिरक्षा के संबंध में कोई भी कथन नहीं किये हैं। विद्वान विचारण न्यायालय के अभिलेख के अवलोकन से यह भी दर्शित नहीं है कि अपीलार्थी/ अभियुक्त द्वारा उक्ताशय का कोई आवेदन पत्र क्षेत्राधिकार की आपत्ति के संबंध में प्रस्तुत किया है। इससे यह दर्शित होता है कि अभियुक्त द्वारा यह प्रतिरक्षा अपील स्तर पर प्रथम बार ली गयी है। अतः बचाव पक्ष को न्यायिक दृष्टांत मेसर्स ब्रिज स्टोन (उपरोक्त) का लाभ प्राप्त नहीं होता है। अतः बचाव पक्ष द्वारा किये गये तर्क उपरोक्त स्थिति में स्वीकार योग्य नहीं है।
अपीलार्थी द्वारा लिखित तर्क में यह बिन्दु उठाये गये हैं कि अभियुक्त ने परिवादी को दिनांक 23.12.21 को नगद 50 हजार रुपये तथा विभिन्न तिथियों पर नियमित रूप से राशि अदा कर चैक की संपूर्ण राशि अदा कर दी है। अभियुक्त द्वारा परिवादी को उसके फोन पेय नंबर 9755990455 पर अंजली पहाड़े के फोन के माध्यम से 15000 रुपये तत्पश्चात् दिनांक 20.03.22 को ग्राम केकड़िया में भादू के घर पर 20,000 रुपये, अप्रैल 2023 में नगद 13,000 रुपये, दिनांक 18.06.22 को नगद 10,000 रुपये, राजकुमार पंडोले द्वारा फोन पेय नंबर 7869898566 से परिवादी के फोन नम्बर 9755990455 पर 10,000 रुपये अदा की है, जिसका स्क्रीनशॉट प्रदर्श डी-1 प्रस्तुत किया है। इस प्रकार परिवादी को अभियुक्त को संपूर्ण राशि अदा कर दिये जाने के जिला चकारण उसका कोई भी दायित्व न होने से अभियुक्त को दोषमुक्त किये जाने का निवेदन किया है।
अभियुक्त द्वारा अभियुक्त परीक्षण में परिवादी को बतौर अमानती चैक देना बताया है, इस प्रकार राशि 1,08,000/- रुपये के दायित्व को भी अभियुक्त द्वारा अस्वीकार नहीं किया गया है, बल्कि यह प्रतिरक्षा ली है कि उसके द्वारा दिनांक 23. 11.21 को 50,000 रुपये तथा बाद में फोन पेय और नगद राशि के माध्यम से उसके द्वारा भुगतान किया गया है, ऐसी स्थिति में अभियुक्त को केवल यही दर्शित करना है कि उसके द्वारा परिवादी को चैक राशि का भुगतान कर दिया गया है, क्योंकि अभियुक्त द्वारा परिवादी के पक्ष में निष्पादित चैक प्रदर्श पी-1 के संबंध में कोई भी विवाद नहीं है।
ऐसी स्थिति में विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा परिवादी के पक्ष में धारा 118 ‘छ’ परकाम्य लिखत अधिनियम के आधार पर “सम्यक अनुकम धारक” होने व जारी चैक “ऋण अथवा विधिक दायित्व” हेतु जारी किया गया था, मानकर होने की कोई त्रुटि नहीं की है।
बचाव पक्ष द्वारा परिवादी झाडू को प्रतिपरीक्षण के दौरान उक्त तर्क अनुसार सुझावे दिये गये हैं, परंतु उक्त सुझाव से ऐसा कोई भी तथ्य प्रकट नहीं हुआ है, जिससे यह प्रतीत हो कि उक्त चैक अनुसार अभियुक्त द्वारा परिवादी को फोन पेय अथवा नगद राशि का भुगतान कर दिया है। झाडू परिवादी साक्षी क.1 ने बचाव पक्ष के सभी सुझाव को अस्वीकार किया है। संजय बचाव साक्षी क.1 ने अपनी साक्ष्य के दौरान परिवादी को राशि अदायगी के संबंध में स्कीन शॉट प्रदर्श डी-1 व तत्संबंध में धारा 65-बी का प्रमाण पत्र प्रदर्श डी-2 को अभिलेख पर प्रस्तुत किया है। स्कीन शॉट प्रदर्श डी-1 के अवलोकन से परिवादी को 10,000 रुपये की राशि अदा की गयी है। संजय बचाव साक्षी क.1 ने उक्त राशि राजकुमार पंडोले के फोन पेय के माध्यम से अदा किये जाने के कथन किये है। इस संबंध में बचाव पक्ष द्वारा चैक राशि
भुगतान के संबंध में ही राशि 10,000 रुपये का फोन पेय के माध्यम से भुगतान के संबंध में कोई भी विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है। इस संबंध में राजकुमार पंडोले, लोकेश साहू, भादू, अंजली पहाड़े सर्वोत्तम साक्षी हो सकते थे, परंतु उक्त साक्षी को बचाव पक्ष द्वारा अपने पक्ष समर्थन में प्रस्तुत नहीं किया है। उल्लेखनीय है कि अभियुक्त ने स्वयं वकालत का व्यवसाय करना बताया है, परंतु उसके द्वारा परिवादी को राशि भुगतान किये जाने के संबंध में कोई भी पावती न लिया जाना भी स्वाभाविक व विश्वसनीय नहीं है। यदि तर्क के लिए उक्त राशि अदा करना मान भी लिया जाये तो परिवादी द्वारा यह परिवाद राशि 1,08,000/- रुपये के भुगतान हेतु प्रस्तुत किया गया है, 10,000/-रुपये को छोड़कर शेष राशि अभियुक्त द्वारा परिवादी को अदा किया जाना दर्शित नहीं होता है। अतः अभियुक्त द्वारा चैक प्रदर्श पी-1 अनुसार परिवादी को मय सूचना पत्र प्रदर्श पी-2 प्रेषित किये जाने के पश्चात् भी मांग राशि का भुगतान किया जाना दर्शित नहीं है। अतः बचाव पक्ष के तर्क स्वीकार योग्य नहीं है कि उसके द्वारा परिवादी को राशि का भुगतान कर दिया गया था।
अपीलार्थी द्वारा यह भी तर्क किये गये है कि विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष परिवादी द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध गलत तरीके से दिनांक 29.07.2022 को समन तामिली दर्शायी गयी है। उक्त समन कैसे व किस पर तामिल हुआ, यह दर्शित नहीं है, तत्पश्चात् अभियुक्त के विरूद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किये गये हैं जो कि सुनियोजित रंजिश के चलते यह योजना बनायी गयी है। अपीलार्थी द्वारा परिवादी अधिवक्ता के विरूद्ध उनके व्यक्तिगत हितों के संबंध में विसंगत रूप से अपील मेमों में बिन्दु उठाये गये हैं जो कि इस अपील की विषय-वस्तु नहीं है।
हस्तगत प्रकरण में विचारण न्यायाय के समक्ष दिनांक 16.05.2023 को अभियुक्त उपस्थित हुआ है तथा उसके द्वारा जमानत आवेदन पत्र प्रस्तुत कर प्रतिभूति का लाभ लिया गया है। विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष बचाव पक्ष द्वारा उक्त बिन्दु को नहीं उठाया गया है। इसके अतिरिक्त अभियुक्त द्वारा समंस तामिल उपरांत उक्तानुसार चैक राशि 15 दिवस के भीतर जमा नहीं की गयी है, इस कारण बचाव पक्ष का उक्त तर्क विचार योग्य नहीं रह जाता है कि उसे समंस की तामिली नहीं हुई अथवा गलत तरीके से तामिल करायी गयी थी। अतः बचाव पक्ष के तर्क में कोई भी बल न होना पाया जाता है।
अतः उपरोक्त विवेचना के आधार पर विद्वान विचारण न्यायालय द्वारापारित आलोच्य निर्णय तथ्य एवं विधि के समुचित विवेचना पर आधारित होना पाया जाता है। विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा अभियुक्त को धारा 138 परकाम्य लिखित अधिनियम पर दोषसिद्ध पाकर कोई भी त्रुटि नहीं की है। अतः अपीलार्थी द्वारा अपील मेमों में उठाये गये आधार स्वीकार योग्य नहीं है।
प्रकरण में आई साक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुये विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि का निष्कर्ष उचित होकर स्थिर रखे जाने योग्य है, हस्तक्षेप के कोई आधार नहीं है। इस कारण विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा दिये गये दोषसिद्धि के निष्कर्ष की पुष्टि की जाती है।
विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थी/ अभियुक्त को 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 के अधीन 6 माह के सश्रम कारावास से दण्डित किया गया है तथा धारा-357 (3) दं०प्र०सं० के अंतर्गत परिवादी को प्रतिकर के रूप में 1,08,000/- रुपये तथा उस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर सहित परिवादी को कुल प्रतिकर राशि 1,31,833/- रुपये अदा किये जाने हेतु आदेशित किया गया है। प्रतिकर राशि अदायगी के व्यतिक्रम में दो माह का सश्रम कारावास से भुगताये जाने का दण्ड दिया गया है। प्रकरण की परिस्थितियों को देखते हुए विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित दण्डादेश न्यायसंगत दर्शित है। फलस्वरूप विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित दण्डादेश की भी पुष्टि की जाती है।
उपरोक्त कारण से विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा आपराधिक प्रकरण कमांक-2/2022 में पारित निर्णय दिनांक-08-04-2024 में दिये गये दोषसिद्धि के निष्कर्ष एवं दिये गये दण्डादेश की पुष्टि करते हुये अपीलार्थी/अभियुक्त की ओर से स्तुत अपील सारहीन होने से निरस्त की जाती है
जुलाई 23 प्रकरण में अपीलार्थी/ अभियुक्त अनुपस्थित है। अतः विचारण न्यायालय को यह आदेशित किया जाता है कि वह निर्णयानुसार अभियुक्त को सजा भुगताये जाने बावत् अभियुक्त/अपीलार्थी के विरूद्ध गिरफ्तारी वारण्ट जारी कर, सजा दी गई हैं ।
