मध्यप्रदेश में रोजगार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा सवाल
भोपाल। मध्यप्रदेश में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कम होने के बावजूद युवाओं के सामने रोजगार का संकट एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत सरकार के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) और नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में बेरोजगारी दर पिछले पांच वर्षों में लगातार घटी है और वर्तमान में यह लगभग 1.5 से 2 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बेरोजगारी दर कम होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई, भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों पर उठ रहे सवाल
कोरोना काल के दौरान वर्ष 2020-21 में प्रदेश की बेरोजगारी दर 4 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई थी। इसके बाद आर्थिक गतिविधियां सामान्य होने के साथ रोजगार के अवसर बढ़े और बेरोजगारी दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई। हालांकि प्रदेश की करीब 60 प्रतिशत आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है, जिससे रोजगार के आंकड़े बेहतर दिखाई देते हैं। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हैं। कुल कार्यबल में सरकारी नौकरियों की हिस्सेदारी लगभग 8 से 10 प्रतिशत मानी जाती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र, एमएसएमई, निर्माण और सेवा क्षेत्र प्रदेश के लगभग 90 प्रतिशत लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। इंदौर, भोपाल और ग्वालियर जैसे शहरों में आईटी, बैंकिंग, रिटेल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का विस्तार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर अभी भी अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाए हैं।

युवाओं का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बीत जाते हैं, जबकि भर्तियां समय पर नहीं निकलतीं या भर्ती प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार के आंकड़े सुधारने के साथ गुणवत्तापूर्ण और स्थायी रोजगार सृजित करने की है। अब सवाल यह है कि बेरोजगारी दर में कमी के सरकारी आंकड़े क्या वास्तव में युवाओं के बेहतर भविष्य की तस्वीर पेश करते हैं, या फिर प्रदेश के लाखों युवा आज भी रोजगार के नए अवसरों का इंतजार कर रहे हैं।
