टाइम्स नाउ मध्य प्रदेश संवादाता रामराव देशमुख बैतूल
अंतराष्ट्रीय महिला दिवस 08 मार्च पर विशेष प्राचीनकाल से आधुनिक युग तक संघर्ष से सफलता की भारतीय नारी की ऐतिहासिक यात्रा – निलेश कौशल अधिवक्त
बैतूल। समाज में महिला और पुरुष मानव समाज के आधार है। परिवार और समाज के स्थायित्व के लिए दोनों की भुमिका महत्वपूर्ण रही है। किसी भी समाज में परिवर्तन एवं विकास का आधार महिला एवं पुरुषों की समानता के उपर निर्भर करता है। किसी भी समाज के विकास का आकलन करना है तो उस समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है, उसका आकलन करके हम समाज के विकास का आकलन कर सकते है। महिलाओं का समाज में पिछडनें से समाज में अराजक स्थिति उत्पन्न होगी और समाज विकास में पिछडने लगेगा। भारतीय इतिहास इसका साक्षी है। जिस समाज में महिलाओं की उपेक्षा कि गई वहां समाज का विकास अवरुद्ध हुआ है।
भारतीय समाज के इतिहास में समाज के विकास में महिलाओं की भूमिका सदैव निर्णायक एवं महत्वपूर्ण रही हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में परिस्थितियों बदलती रही हैं लेकिन भारतीय नारी ने अपने ज्ञान कौशल, परिश्रम और साहस से प्रत्येक कालखंड में समाज की दिशा को प्रभावित किया हैं। भारतीय समाज के सुधार आंदोलनों में भारतीय नारी ने उसकी यात्रा के प्रत्येक खंड में उसकी स्थिति में सुधार कर परिवर्तन के प्रेरक कार्य कर समाज परिवर्तन में अपनी बदलती भूमिका की गाथा स्वंय भारतीय नारी ने अपने प्रयासों से लिखी हैं।
भारत में महिलाओं के प्रति वैदिक काल से समाज मे उनके प्रति दृष्टिकोण सम्मानीय रहा है। भारत में महिलाओं के संदर्भ में कहा जाता है कि ‘यत्र नार्यास्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता” अर्थात् जहां महिलाओ का सम्मान होता है, पूजा होती है वहां देवता निवास करते है। इस आदर्श के साथ समाज में हमने महिलाओं में देवताओं के दर्शन किये हैं। भारत में महिलाओं के प्रति गौरव की अनुभूति इस प्रकार की जा सकती हैं कि हमने विधा का आदर्श सरस्वतीजी में, धन का आदर्श लक्ष्मीजी में, पवित्रता का आदर्श गंगाजी में, पराक्रम का आदर्श दुर्गाजी में देखा है।

भारतीय समाज के विभिन्न कालखंडों में महिलाओं की स्थिति एक जैसी नही रही है। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान समय तक महिलाओं की स्थिति का इतिहास प्रत्येक कालखंड अनुसार बदलता गया हैं। बदलते कालखंड के साथ महिलाओ ने अपने पराक्रम से अपनी स्थिति में सुधार किया हैं। भारतीय समाज के इतिहास का वास्तविक काल वैदिका काल ही रहा है।
वैदिक काल में शास्त्रों में निपूण एवं पारंगत पुरुषों के साथ महिलाओं का भी नाम आया इनमें प्रमुख रुप से घोषा, देवयानी, इन्द्रानी, मैत्रेयी, गार्गी, जैसी विदुषी महिलाओं ने शास्त्रार्थ में पुरुषों के साथ समान स्थान प्राप्त किया। है। वैदिक काल में महिला एवं पुरुषों के लिये समान अधिकार थे इस काल में विधवा पुर्नविवाह की अनुमति थी। पुत्री को पिता की संपत्ति अधिकार था। वैदिक काल के बाद उत्तर वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति में गिरावट आने लगी वैदिक काल में पिंडदान आदि के लिये पुत्रों की कामना कि जाने लगी वैदिक युग में पुत्रियों के जन्म को बुरा माना जाने लगा। महिलाओं के अधिकारो को सीमित कर दिया गया महिलाओं का धार्मिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया, बाल विवाहो का प्रचलन तथा विधवा पुनर्विवाह पर रोक इसी काल में लगी। महिला शिक्षा को सीमित कर दिया गया। उत्तर वैदिक युग में महिलाओं की स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ा इस कारण महिलाओं का जीवन स्तर इस काल में प्रभावित हुआ हैं।
वैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल के बाद महिलाओ की दृष्टि से मध्यकाल काला युग है। मध्यकाल में महिलाओं के उपर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगायें गये। बलपूर्वक महिलाओं के धर्म परिवर्तन किये गये, उनके साथ बलपूर्वक ज्यादतिया प्रारंभ कि गई जिसके कारण महिलाओं के उपर अनेक प्रतिबंध लगे इस काल में महिलाओं को अकेली न रहकर हमेशा उन्हें किसी न किसी के संरक्षण में रहना पड़ता था। महिलाओ का कार्यक्षेत्र घर तक सीमित कर दिया गया।
पूर्व आधुनिक काल इस काल में महिलाओं की स्थिति सुधार के लिये कोई विशेष प्रयास नही हुये। इस काल में समाज सुधारकों के द्वारा चलाये गये आंदोलन और प्रयासों के कारण विशेष तौर पर राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंदजी, ईश्वरचंद्र विधासागर, ज्योतिबा फुले, दयानंद सरस्वती आदि के प्रयासों के कारण महिलाओं की स्थिति में आशातीत सफलता प्राप्त हुयी। इसी काल में बाल विवाह को बंद करने, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा, सती प्रथा, बहु विवाह जैसी कुरीतियों को समाप्त किया गया साथ ही महिलाओं को पिता की संपत्ति संबंधी अधिकारों के लिये संघर्ष भी इसी काल में किया गया। इसी काल में सती प्रथा निषेध अधिनियम 1829, हिन्दु विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856, बाल विवाह अवरोध अधिनियम 1929, हिन्दु महिलाओं का संपत्ति पर अधिकार अधिनियम 1937, आदि अधिनियम महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन लाने के लिये बनाये गये जो कालांतर में महिलाओं के हित में मील का पत्थर साबित हुये। भारतीय महिलाओं को वास्तविक लाभ स्वतंत्रता के बाद आधुनिक युग में ही मिल पाया। भारतीय संविधान में प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक, महिला पुरुष को समान मानता है।

महिलाओ की स्थिति में पराम्परागत समाजिक ढांचे में बदलाव लाने हेतु अनेक सामाजिक विधानों का निर्माण किया गया जिसमें हिन्दु विवाह तथा विवाह विच्छेद अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, मानक अधिकारों का सरक्षण अधिनियम 1976, बाल अपराध अधिनियम 1986, सती प्रथा पर महिमा मंडन (प्रतिषेध) अधिनियम 1987, आदि पारित किये गये। महिलाओं की राजनैतिक स्थिति में सुधार हेतु पंचायत स्तर पर उन्हे आरक्षण का लाभ दिया गया तो वहीं विधानसभा और संसद के लिये प्रस्ताव विचाराधीन है।
सामान्यतः माना जाता है कि कुल जनसख्या का 50 प्रतिशत जनसंख्या महिलाओ की है। लेकिन तथ्यतः यह सत्य नही हैं भारत में सन् 2001 की जनगणना के आधार पर 1000 पुरुषों के मुकाबले 933 महिलाएँ हैं। इस जनगणना से यह सिद्ध होता है कि भारत में महिलाओं की जनसंख्या 48 प्रतिशत है। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 के समस्त अधिकार महिला तथा पुरुष दोनों को समान रुप से प्राप्त थे। अनुच्छेद 2 में कहा गया है कि लिंग के विभेद के बिना यह अधिकार महिला और पुरुष दोनों को प्राप्त है। अनुच्छेद 16 (1) में वयस्क पुरुष और महिला को किसी भी भेदभाव के बिना विवाह करने का अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 16 (2) में विवाह के इच्छुक पक्षकारों को स्वतंत्र और पूर्ण सहमति से विवाह करने का अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 23 (2) में बिना भेदभाव समान कार्य के लिये समान वेतन प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है।
महिलाओं को पुरुषों के समान राष्ट्रीयता प्रदान करने के लिये अंतराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं के लिए राष्ट्रीयता अभिसमय 29 जनवरी 1957 को पारित किया यह अभिसमय 11 अगस्त 1958 से प्रवर्तन में आया। इस अभिसमय के प्रवर्तन में आने के कारण महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त हुआ कि वह स्वेच्छा से राष्ट्रीयता ग्रहण कर सकती है। संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 20 दिसम्बर 1952 को महिलाओं को राजनैतिक अधिकार का अभिसमय अंगीकार किया। यह 7 जुलाई 1954 से प्रवर्तन में आया। इस अधिकार के द्वारा महिलाओं को मत देने, राजनैतिक पद को धारण करने, राजनैतिक पद के लिये चुनाव लड़ने के लिये पुरुषों के समान ही अधिकार प्रदान किये गयें है।
अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं कि स्थिति में सुधार लाने के लिए अनेक उपाय किए गये आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा जून 1946 को घठित आयोग पूर्ण रुप से महिलाओं की स्थिति के संबंध में था। इसके अतिरिक्त विश्व स्तर पर सन् 1975 में अंतराष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया गया इस सम्मेलन में महिलाओं को शिक्षा, प्रशिक्षण, विवाह, आर्थिक व सामाजिक एवं सास्कृतिक विकास एवं संरक्षा संबधी सभी विषयों की घोषणा कि गयी।
अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं कि स्थिति में सुधार लाने के लिए किये गये उपायों के संदर्भ में यदि भारतीय परिवेश में देखा जाये तो भारत के संविधान में महिलाओं को पुरुषों के समान आर्थिक, सामाजिक, एवं राजनैतिक समानता को समान रुप से प्राप्त करने के लिये अवसर प्रदान करने के लिये विशेष उपबंध भारतीय संविधान में किये गये हैं। विधायिका ने अनुच्छेद 15 (3) के आधार पर ही राष्ट्रीय तथा राज्य महिला आयोग के गठन का अधिनियम 1990 में पारित किया गया। अनुच्छेद 15 (1) के तहत लिंग भेद को प्रतिबंधित किया गया, अनुच्छेद 15 (3) के तहत महिलाओं को सरकारी सेवाओं में प्राथमिकता दी जा सकती है। अनुच्छेद 23 (1) में मानव दुर्व्यापर को प्रतिबंधित किया गया। अनुच्छेद 42 में महिलाओं के काम की न्यायसंगत दशाओं का वर्णन है। एवं अन्य प्रावधानों के तहत महिलाओं को नगरीय निकाय, ग्राम पंचायत एवं विधानसभा एवं लोकसभा में महिलाओं के लिये आरक्षण की व्यवस्था लागु कि गयी है।
जहाँ एक ओर महिलाओ को संविधान में समानता का अवसर प्रदान किया गया वही दुसरी ओर उनके साथ होने वाले अपराधों से संरक्षण प्रदान करने के लिये भारतीय न्याय व्यवस्था में विशेष प्रावधान किये गये हैं। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों की गंभीरता को ध्यान में रखकर विशेष उपबंध भारतीय दंड विधान की धारा 354, 354 (ए), 354 (बी), 354 (सी), 354 (डी), 509, 363, 366, 376 (1), 376 (2), 376 (3), 376 (ए.बी.), 376 (ए), 376 (बी), 376 (सी), 376 (डी) में किये गये थे। वही परिवर्तित कानूनों में भारतीय न्याय संहिता में धारा 64, 65(1), 65 (2), 66, 67, 68, 69, 70 (1), 70 (2), 74, 75, 76, 77, 78, 79, 137 (2),140 (3), के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति किसी महिला की लज्जा भंग करता है तो उसे दंडनीय अपराध माना गया है। यदि कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम आयु कि लड़की को उसकी विधिक संरक्षक की सहमति के बिना ले जाता है तो उसे धारा 363 के तहत दंडनीय अपराध माना गया है तथा ऐसे व्यक्ति को 7 साल तक का कारावास की सजा मिल सकती है। भारतीय दंड विधान की धारा, 498-क, धारा 416 आदि के द्वारा महिलाओं को विधिक अधिकार प्रदान कर उनकी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।
भारत में एक ओर जहाँ अपराधों से संरक्षण प्रदान किया हैं तो वही उनके साथ वैवाहिक घर में होने वाली हिंसा से संरक्षण देने के लिये घरेलू हिंसा से महिलाओं का सरक्षण अधिनियम कानून बनाकर उनकों संरक्षित किया गया है महिलाओं को भरण पोषण का अधिकार भारतीय कानून में प्रदान किया गया है राष्ट्रीय एवं राज्य महिला आयोग के द्वारा लगातार महिलाओं के हित में कार्य किये जाकर महिलओं की स्थिति में सुधार किया जा रहा हैं।
भारतीय समाज में महिलाओं के कल्याण के लिये किये गये सार्थक प्रयासों के अतिरिक्त महिलाओं ने स्वयं के प्रयास से खुद को स्थापित करने के लिये प्रत्येक कालखंड में बदलते परिवेश में अपने सामर्थ, त्याग, धैर्य एवं शौर्य से स्वंय को स्थापित करने का कार्य किया हैं। भारतीय नारी की प्राचीनकाल से वर्तमान समय तक की यात्रा की ओर दृष्टिपात करें तो देखेगे की भारतीय नारी ने प्रत्येक कालखंड को प्रभावित किया हैं। संघर्षकाल से प्रारंभ हुई यात्रा का प्रत्येक पड़ाव उसके संघर्ष की कहानी बया कर रहा हैं। संघर्षकाल से वर्तमान तक की यात्रा में संघर्ष से सफलता तक परिवर्तन की अविस्मरणीय यात्रा की वह स्वंय सूत्रधार हैं।
भारतीय नारी की इस यात्रा में भारत के स्वाधीनता संग्राम से लेकर अंतरिक्ष तक की यात्रा में महिलाओं का योगदान हैं। भारत के स्वाधीनता समर में झॉसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, जैसी वीरांगनाओं के नेतृत्व में स्वाधीनता के समर में संघर्ष किया तो वही दूसरी ओर सरोजनी नायडू, कस्तुरबा गाँधी, अरुणा आसफ अली, जैसी महिलाओं ने स्वाधीनता समर में महिलाओं का नेतृत्व किया हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में इंदिरा गाँधी, राजमाता सिंधिया, सुमित्रा महाजन, सुषमा स्वराज, वसुन्धरा राजे सिंधिया, उमा भारतीजी, निर्मला सीतारमण, एवं वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमति द्रोपदी मुर्मु ने भारतीय राजनीति में अपने स्वंय को सिद्ध करने का कार्य किया हैं। नारी शिक्षा के लिये त्योतिबा फुले का योगदान विचारणीय हैं।
आज भारतीय महिलाएँ सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं हैं जहाँ महिलाओं ने अपने कौशल का प्रकटीकरण नही किया हों। सुनिता विलियम्स, कल्पना चावला ने अंतरिक्ष की उड़ान भरी तो वैज्ञानिक अनुसंधानों में महिलाओं ने अपनी प्रतिभा प्रकट कि हैं। आज महिलाऐं सेना में भर्ती होकर ना केवल उच्च पदों को सुशोभित कर रही हैं बल्कि युद्ध क्षेत्र में फाइटर विमानों को कुशलता से उड़ा रही हैं। व्यापार जगत में भी आज महिलाऐ पीछे नही हैं इंदिरा नूई, किरण मजूमदार शाह, शहनाज हुसैन, मल्लिका श्रीनिवासन, नीता अंबानी, जैसी महिलाओं ने व्यापार जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी हैं। तो संगीत जगत में स्वर कोकिला का नाम से प्रसिद्ध लता मंगेशकर जी, कविता कृष्णमूर्ति, अनुराधा पौडवाल, अलका याग्निक, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान, ने यश प्राप्त किया है। खेल जगत में पी.टी. उषा, मेरी कॉम, साइना नेहवाल, पी.वी. सिंधू, बबिता फोगाट, विनेश फोगाट, हरमनप्रीत कौर, मिताली राज, झूलन गोस्वामी, स्मृति मंधाना, ने खेल जगत में विश्व में प्रसिद्धि प्राप्त कर विश्व में भारत का नाम रोशन किया हैं। भारतीय महिलाओं की प्राचीनकाल से वर्तमान आधुनिक युग की यात्रा से प्रमाणित हैं कि उसकी यात्रा संधर्ष से सफलता तक की स्वर्णिम एवं ऐतिहासिक यात्रा हैं। प्रत्येक कालखंड के समयानुसार उसने स्वंय को सिद्ध कर अपने आत्मविश्वास को मजबूत कर आत्मविश्वास और स्वाभीमान के साथ इस कंकरीली, पथरीली यात्रा मार्ग के पड़ाव को पारकर स्वंय को स्थापित कर स्वंयसिद्वा बनी हैं।

