1 नवंबर 2025 को देश का दिल — मध्यप्रदेश — अपना 70वां स्थापना दिवस मना रहा है। आज से सात दशक पहले यानी 1 नवंबर 1956 को यह राज्य अस्तित्व में आया था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रदेश आने वाले वर्षों में अपने उतार-चढ़ाव भरे इतिहास, संघर्षों और उपलब्धियों से देश के मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाएगा।
1 नवंबर 2025 को देश का दिल — मध्यप्रदेश — अपना 70वां स्थापना दिवस मना रहा है। आज से सात दशक पहले यानी 1 नवंबर 1956 को यह राज्य अस्तित्व में आया था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रदेश आने वाले वर्षों में अपने उतार-चढ़ाव भरे इतिहास, संघर्षों और उपलब्धियों से देश के मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाएगा।
देश का दिल मध्यप्रदेश: संघर्ष, संयोग और गौरव की 70 साल की कहानी, मध्यप्रदेश 70वां स्थापना दिवस
1 नवंबर 2025 को देश का दिल — मध्यप्रदेश — अपना 70वां स्थापना दिवस मना रहा है। आज से सात दशक पहले यानी 1 नवंबर 1956 को यह राज्य अस्तित्व में आया था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रदेश आने वाले वर्षों में अपने उतार-चढ़ाव भरे इतिहास, संघर्षों और उपलब्धियों से देश के मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाएगा।

मध्यप्रदेश का जन्म — एक संयोग से बना राज्य
मध्यप्रदेश का गठन भाषायी आधार पर हुआ था। दरअसल, 1952 में आंध्र प्रदेश में श्रीरामालु की भूख हड़ताल से देशभर में भाषायी राज्यों की मांग तेज हो गई। इसके बाद 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया जिसने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की सिफारिश की।
आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, गैर-हिंदी भाषी राज्यों के हिंदीभाषी जिले और तहसीलों को मिलाकर एक नया राज्य बनाया गया, जिसमें मध्यभारत, महाकौशल, भोपाल और विंध्य प्रदेश को जोड़ा गया। इस तरह 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश का जन्म हुआ।
नेहरू की प्रतिक्रिया — “ऊंट जैसा दिखता राज्य”
जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नए राज्य का नक्शा देखा तो उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, “यह क्या ऊंट की तरह दिखने वाला राज्य बना दिया!”

राजधानी की जंग — क्यों बनी भोपाल राजधानी?
राज्य गठन के बाद सबसे बड़ी बहस थी — राजधानी कौन बने?
इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर तीनों प्रमुख दावेदार थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल रायपुर को राजधानी बनाना चाहते थे। आयोग ने भी जबलपुर का नाम सुझाया था, लेकिन अंततः भोपाल चुना गया।
इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं —
- भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खां की संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए भोपाल को प्रशासनिक केंद्र बनाना ज़रूरी समझा गया।
- एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, जबलपुर के सेठ गोविंददास ने बड़ी मात्रा में जमीन खरीदी थी। यह आशंका जताई गई कि जबलपुर राजधानी बनने पर उन्हें बड़ा आर्थिक लाभ होगा।
जब जबलपुर में नहीं मनी थी दीवाली
भोपाल के राजधानी बनने की घोषणा के बाद जबलपुर में गहरा असंतोष था। प्रतिनिधिमंडल दिल्ली जाकर नेहरू, मौलाना आज़ाद, लाल बहादुर शास्त्री और गोविंद वल्लभ पंत से मिला, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। कहा जाता है कि उस साल जबलपुर में दीवाली नहीं मनाई गई थी — शहर अंधेरे में डूबा रहा।
बाद में विनोबा भावे ने जबलपुर को सांत्वना देते हुए “संस्कारधानी” की उपाधि दी, जो आज तक इस शहर की पहचान है।
मध्यप्रदेश का सफर — त्रासदी और उपलब्धियों से भरा
70 वर्षों के इतिहास में मध्यप्रदेश ने कई दर्दनाक घटनाओं और गौरवशाली क्षणों का सामना किया।
- 1984 की भोपाल गैस त्रासदी ने पूरी दुनिया को हिला दिया।
- हरसूद शहर बांध निर्माण के कारण डूब गया।
- वहीं, प्रदेश ने खेल, संस्कृति, पर्यटन और कृषि में देश को नई दिशा भी दी।
