टाइम्स नाउ मध्य प्रदेश भोपाल प्रतिनिधि रितेश मेवाड़ा :
भोपाल की वह यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री, जिसने 41 साल पहले दुनिया की सबसे भयानक गैस त्रासदी को जन्म दिया था, आज फिर सुर्खियों में है। 2-3 दिसंबर 1984 की उस रात सिर्फ 24 घंटे में 3,787 लोग मारे गए थे, जबकि बाद में कुल मौतों का आंकड़ा लगभग 35 हजार तक पहुंचा। हजारों परिवार तबाह हो गए, पीढ़ियाँ आज भी बीमारी का दर्द झेल रही हैं। इस मौत की फैक्ट्री को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था और इसका हानिकारक कचरा पीथमपुर में ले जाकर नष्ट किया गया था।

लेकिन अब इस वीरान, प्रतिबंधित और संवेदनशील परिसर में एक नया खेल शुरू हो गया है। जिस जगह को सुरक्षा और निगरानी में रहना चाहिए, वहां बिना अनुमति लोगों का आना-जाना शुरू हो गया है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा की जिम्मेदारी जिनके हाथों में है, वही कुछ लोग चंद पैसों के लालच में फैक्ट्री के अंदर ‘भ्रमण’ करवा रहे हैं।
500 रुपए में जहरीली फैक्ट्री की सैर
यह ‘टूर’ खुलेआम चल रहा है—कोई पहचान पूछने वाला नहीं, कोई रोक-टोक नहीं। जर्जर इमारतें, जहरीले हादसे की यादें और संवेदनशील संरचनाएँ; सब कुछ पर्यटकों की तरह देखने को दिखा दिया जाता है। सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्रशासन की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या मौत की फैक्ट्री अब कमाई का नया अड्डा बन गई है? और सबसे बड़ा सवाल—इतनी त्रासदी झेल चुके इस स्थल की सुरक्षा का जिम्मा आखिर कौन लेगा?

